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लोकसभा चुनाव

Explainer: 7 दशक में देश ने देखीं 12 गठबंधन सरकारें, सामने होती हैं ये चुनौतियां, कैसे निपटेंगे नरेंद्र मोदी?

नरेंद्र मोदी रविवार को प्रधानमंत्री पद के रूप में शपथ लेने वाले हैं. वो 2002 से 2024 तक 3 बार मुख्यमंत्री और 2 बार प्रधानमंत्री रहे हैं. इन वर्षों में उन्होंने एकछत्र राज किया है. ऐसे में वो गठबंधन सरकार की चुनौतियों से कैसे निपटेंगे.

Updated on: 08 Jun 2024, 06:17 PM

New Delhi:

Coalition Governments Challenges: देश में पहला आम चुनाव 1952 में हुआ था. तब से लेकर अब तक 7 दशकों के चनावी सफर में देश ने करीब 12 गठबंधन सरकारें देखी हैं. अब भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) देश में एनडीए गठबंधन सरकार बनने जा रही है. नई सरकार की स्थिरता बहुत हद तक जनता दल (यूनाइटेड) और तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) के भरोसे पर है. नरेंद्र मोदी रविवार को प्रधानमंत्री पद के रूप में शपथ लेने वाले हैं. उनके राजनीतिक सफर को देखें तो वो 2002 से 2024 तक तीन बार मुख्यमंत्री और दो बार प्रधानमंत्री रहे हैं. इन वर्षों में उन्होंने एकछत्र राज किया है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मोदी को गठबंधन सरकार चलाने का अनुभव नहीं है. गठबंधन सरकारों के सामने अस्थिरता, क्षेत्रवाद और भ्रष्टाचार समेत कई चुनौतियां होती हैं. ऐसे में नरेंद्र मोदी इन चुनौतियों से कैसे निपटेंगे.

कब बनी पहली बार गठबंधन सरकार

देश में पहली बार 1977 में गठबंधन की सरकार बनी. यह जनता पार्टी की सरकार थी, जिसके प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी थे. वे पहले गैर कांग्रेसी प्रधानमंत्री थे. जनता पार्टी में कुल 13 दल शामिल थे. हालांकि, वे 1980 तक ही पद पर बने रह सके. इसके बाद देश में कब और किस गठबंधन सरकारें नीचे दी गए सूची में आप देख सकते हैं. 

देश में कब-कब रहीं गठबंधन सरकारें

गठबंधन साल प्रधानमंत्री
जनता पार्टी 1977-79 मोरारजी देसाई
जनता पार्टी (सेक्युलर) 1979-80 चरण सिंह
राष्ट्रीय मोर्चा 1989-90 वीपी सिंह
जनता दल (सोशलिस्ट) 1990-91 चंद्र शेखर
संयुक्त मोर्चा 1996-97 एचडी देवेगौड़ा
संयुक्त मोर्चा 1997-98 इंद्र कुमार गुजराल
बीजेपी नेतृत्व वाला गठबंधन 1998-99 अटल बिहारी वाजपेयी
एनडीए 1999-2004 अटल बिहारी वाजपेयी
यूपीए 2004-09 मनमोहन सिंह
यूपीए 2009-14 मनमोहन सिंह
एनडीए 2014-19 नरेंद्र मोदी
एनडीए 2019-24 नरेंद्र मोदी

 

मोदी के सामने होंगी ये चुनौतियां

1- सभी दलों को साथ लेकर चलना

गठबंधन सरकारों की सबसे बड़ी चुनौती है सभी दलों को साथ लेकर चलना होती है. असल में, गठबंधन सरकारें अक्सर कमजोर होती हैं. अगर कोई भी पार्टी अपना समर्थन वापस ले लेती है, तो वे गिर सकती हैं. जिससे सरकार में बार-बार बदलाव होता है और राजनीतिक अस्थिरता होती है. गठबंधन सरकारों के इतिहास को देखें तो छह मौकों पर जब एक गैर-कांग्रेसी, गैर-बीजेपी नेता ने गठबंधन की सरकार चलाई तो तो वे पूरे 5 साल का कार्यकाल नहीं चल पाईं. ऐसे में नरेंद्र मोदी के सामने भी एनडीए के सभी सहयोगी दलों को साथ लेकर चलने की चुनौती होगी. 

अभी की पॉलिटिकल सिचुएशन में बीजेपी नीतीश कुमार और चंद्रबाबू नायडू के सहारे ही बीजेपी सत्ता में रह सकती है. इसकी वजह है कि बीजेपी के पास 240 सीटें हैं. वह बहुमत से 32 सीटें पीछे हैं. वहीं बीजेपी की अगवाई वाले एनडीए अलांयस के पास 292 सीटें हैं, जिनमें जेडीयू की 12 और टीडीपी की 16 सीटें भी शामिल हैं. अगर ये दोनों ही NDA का साथ छोड़ दें तो एनडीए सरकार अल्पमत में आ जाएगी. ऐसे में सरकार पर गिरने का संकट गहरा जाएगा. यह सरकार बिना नीतीश कुमार और चंद्रबाबू नायडू के सहयोग के बिना नहीं चल पाएगी. नीतीश कुमार कब पलट जाएं कुछ कहा नहीं जा सकता है.

2- क्षेत्रवाद

गठबंधन सरकारें जब बनती हैं तो उनमें शामिल कई दल क्षेत्रीय होते हैं. हर राज्य के अपने क्षेत्रीय हित होते हैं, जो गठबंधन सरकारों के राष्ट्रीय एजेंडे से टकराव का कारण बनते हैं. जैसे अभी NDA के सहयोगी दल जेडीयू के नीतीश कुमार और टीडीपी के चंद्रबाबू नायडू के हैं. नीतीश बिहार के लिए तो चंद्रबाबू नायडू आंध्र प्रदेश के लिए सालों से विशेष राज्य के दर्जे की मांग करते आए हैं. नरेंद्र मोदी ने अपने पहले और दूसरे कार्यकाल में नीतीश-नायडू की इस मांग को 'केंद्र पर बोझ' बताकर मानने से इनकार कर दिया था. अब जब नीतीश-नायडू की गठबंधन में अहमियत अहम हो गई है, ऐसे में मोदी इस मसले पर कैसे आगे बढ़ते हैं, यह देखने वाली बात होगी.

3.  वैचारिक मतभेद

अग्निवीर स्कीम को ही देखें तो इस पर बीजेपी और जेडीयू के बीच वैचारिक मतभेद दिखता है. हालांकि, गठबंधन सरकारों में ऐसा होना स्वभाविक है, क्योंकि गठबंधन में शामिल दलों की विचारधाराएं अक्सर अलग-अलग होती हैं, जिससे महत्वपूर्ण नीतिगत मामलों पर आम सहमति बनाना चुनौतीपूर्ण हो जाता है. अब नरेंद्र मोदी के सामने अग्निवीर स्कीम ही नहीं कई अन्य मसलों पर सहयोगी दलों के वैचारिक मतभेदों को 'सहमति की टेबल' पर लाने की चुनौती होगी.

4. सत्ता का एक केंद्र बनाए रखना

मोदी ने बीते 10 वर्षों के कार्यकाल में एकछत्र राज किया. उन्होंने अपनी नीतियों को जैसे चाहा वैसे लागू किया. लेकिन अब वो सत्ता में सहयोगी दलों की भागीदारी बढ़ाएंगे. उनकी सुनी जाएगी, तो सरकार चल पाएगी. कई दलों के शामिल होने से गठबंधन के भीतर अक्सर सत्ता के कई केंद्र बनते हुए दिखाई पड़ते हैं, जिससे सत्ता संघर्ष का जन्म होता है और फिर निर्णय लेने में गतिरोध पैदा हो सकता है. ऐसे में मोदी के सामने अपने तीसरे कार्यकाल में सत्ता का एक केंद्र बनाए रखने की भी चुनौती होगी. 

5. भ्रष्टाचार

गठबंधन सरकारों में भ्रष्टाचार सबसे बड़ी दिक्कत के रूप में उभरता है. जैसा हमने कांग्रेस की अगुवाई वाली राष्ट्रीय प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) के दूसरे कार्यकाल में देखा था. गठबंधन सरकारों में होता ऐसा है कि पार्टियां अपने समर्थन के बदले में व्यक्तिगत लाभ के लिए अपने पद या प्रभाव का इस्तेमाल कर सकती हैं. ऐसे में अब तक 'न खाऊंगा और न खाने दूंगा' ये कहने वाले नरेंद्र मोदी के सामने करप्शन की समस्या से निपटना भी एक चुनौती होगी.